धन “सेवा”योग के लिये है. धन ही लक्ष्मी है और सेवा ही नारायण है
धन “सेवा”योग के लिये है. धन ही लक्ष्मी है और सेवा ही नारायण है
हमें परमात्मा ने विभिन्न प्रकार का सामर्थ्य इसलिये प्रदान किया है जिससे हम परमात्मा की संतानो की, समस्त मानवता की उस विभिन्न प्रकार के सामर्थ्य के माध्यम से सेवा कर सकें, उनके जीवन को पूर्णतृप्त बना सकें. जो केवल स्वयं के लिये जीता है उसका जीना मृत्यु के समान है.
जिन्हे धनप्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त है उन्होंने सेवा का उद्देश्य हृदय में धारण करते हुए धनप्राप्त अवश्य करना चाहिए. धन भोग के लिये नही है , धन “सेवा”योग के लिये है. धन ही लक्ष्मी है और सेवा ही नारायण है. प्रत्येक नरनारी के भितर जो विद्यमान है वो है नारायण और धन अर्थात लक्ष्मी है नरनारी को नारायण से जोड़ने वाली शक्ति. ऐसे मनुष्य सौभाग्यशाली है जिनके पास धनसामर्थ्य (लक्ष्मी) है और हृदय में निष्काम सेवाभाव (नारायण) भी है. रावण ने सिता (लक्ष्मी/धन) को बड़ी चालाकी से, कुटीलता से प्राप्त तो किया किन्तु जीवन में राम (नारायण/सेवाभाव/व्यापकता) से शत्रुता के कारण अपने सोने कि लंका को गंवाना पड़ा. यह है ऋषियों का अर्थशास्त्र और परम-अर्थशास्त्र को समझाने का सरल तरीका. लक्ष्मी (धन) को नारायण (सेवा) से जोड़ो अन्यथा प्रत्येक व्यक्ति की छोटी मोटी सोने की लंका का विनाश निश्चित है. लक्ष्मीनारायण (सिताराम) का एक होना ही जीवन का शाश्वत सत्य है जो रावण के समान कुबुद्धि लोग समझ नहीं पाते और परिणाम होता है जीवन का विनाश. उठो! जागो! स्वयं को समझो! स्वयं को जानो! होश मे आओ! बेहोश मत रहो!
– स्वामी श्रीकंठानंद 9822703688
– प्रवर्तक – जागृत नाशिक भारत विश्व अभियान



